कविता : रात धीरे-धीरे

रात धीरे-धीरे रात धीरे-धीरे दीवार फाँद गई, चाँद मेरी छत से होकर गुज़र गया जुगनुओं का शोकगीत अब भी जारी है। गर्मागर्म मुद्दों की अलाव…