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हमेशा के लिए दूर न चली जाए गौरैया-फादर पी विक्टर

जौनपुर (विकास राय): सेण्ट जान्स स्कूल सिद्दिकपुर जौनपुर के प्रधानाचार्य फादर पी विक्टर ने कहा की प्रकृति की सभी रचनाएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष एक-दूसरे पर निर्भर हैं और उनमें हमारे साथ-साथ नन्ही गौरैया भी शामिल है।

घर हमारे बड़े-बड़े हो गए हैं, पर दिल इतने छोटे कि उनमें नन्हीं-सी गौरैया भी नहीं आ पा रही. घर-घर की चिड़िया गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. यूरोप में गौरैया संरक्षण-चिंता के विषय वाली प्रजाति बन चुकी है और ब्रिटेन में यह रेड लिस्ट में शामिल हो चुकी है. भारत में भी पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ सालों में गौरैया की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है. लगातार घटती इसकी संख्या को अगर हमने गंभीरता से नहीं लिया, तो वह दिन दूर नहीं, जब गौरैया हमेशा के लिए हमसे दूर चली जाएगी.

भारत के बहुत-से हिस्सों जैसे बैंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दूसरे शहरों में गौरैया की स्थिति बहुत चिंताजनक है. यहां वे दिखाई देना मानो बंद-सी हो गई हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इनकी संख्या आंध्र प्रदेश में 80 फीसदी तक कम हुई है और केरल, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में इसमें 20 फीसदी तक की कमी देखी गई है. इसके अलावा तटीय क्षेत्रों में यह गिरावट निश्चित रूप से 70 से 80 प्रतिशत तक दर्ज की गई है.

गौरैया के इस तरह गायब होते जाने के कारणों की पड़ताल की जाए तो हम मनुष्यों की आधुनिक जीवन शैली और पर्यावरण के प्रति उदासीनता इसका सबसे बड़ा कारण नज़र आती है. आधुनिक बनावट वाले मकानों में गौरैया को अब घोंसले बनाने की जगह ही नहीं मिलती. जहां मिलती है, वहा हम उसे घोंसला बनाने नहीं देते. अपने घर में थोड़ी-सी गंदगी फैलने के डर से हम उसका इतनी मेहनत से तिनका-तिनका जुटाकर बनाया गया घर उजाड़ देते हैं. इससे उसके जन्मे-अजन्मे बच्चे बाहर बिल्ली, कौए, चील, बाज जैसे परभक्षियों का शिकार बनते हैं.

गौरैया छोटे पेड़ों या झाड़ियों में भी घोंसला बनाती है. लेकिन मनुष्य उन्हें भी काटता-छांटता जा रहा है. वह बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी आदि पेड़ों को पसंद करती है. पर अब या तो इन्हें लगाने के लिए अब जगह नहीं बची है या इतना सब सोचने की हमारे पास फुर्सत नहीं है. शहरों और गांवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फ़ोन के टावर भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए बड़ा ख़तरा बने हुए हैं. इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं. इसके अलावा उनके दाना-पानी की भी समस्या है. गौरैया मुख्यतः काकून, बाजरा, धान, पके चावल के दाने और कीड़े खाती है. आधुनिकता उनसे प्राकृतिक भोजन के ये स्रोत भी छीन रही है.

हम गौरैया को क्यों बचाएं? इस सवाल का जवाब केवल इंसानियत नहीं है. गौरैया का कम या विलुप्त होना इस बात का संकेत है कि हमारे आसपास के पर्यावरण में कोई भारी गड़बड़ चल रही है, जिसका खामियाजा हमें आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा. अगर हम गौरैया को संरक्षण प्रदान कर उसे जीवनदान देते हैं, तो वह भी पारिस्थितिक तंत्र के एक हिस्से के रूप में हमारे पर्यावरण को बेहतर बनाने में अपना योगदान देती है. वह अपने बच्चों को अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े भी खिलाती है, जो हमारी फसलों के लिए हानिकारक होते हैं. प्रकृति की सभी रचनाएं कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और हम भी उनमें शामिल हैं.

विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं. नेचर फॉरेवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के विशेष प्रयासों से पहली बार वर्ष 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था. तब से ही यह दिन पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है. गौरैया के जीवन संकट को देखते हुए वर्ष 2012 में उसे दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्जा भी दिया गया था. पर हालात अभी भी जस के तस ही हैं. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी सिटीज़न स्पैरो के सर्वेक्षण में पता चला कि दिल्ली और एनसीआर में वर्ष 2005 से गौरैया की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. सात बड़े शहरों में हुए इस सर्वेक्षण में सबसे ख़राब नतीजे हैदराबाद में देखने को मिले. उत्तर प्रदेश में भी सपा सरकार के समय गौरैया के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास और जागरूकता अभियान चलाए गए थे, पर वर्तमान में वे सब ठप्प पड़े हैं.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था भारतीय जैव विविधता संरक्षण संस्थान की अध्यक्ष सोनिका कुशवाहा बताती हैं – ‘गौरैया के संरक्षण की प्रक्रिया में एक मुश्किल उसकी गणना में आती है. फिर भी रिहायशी और हरियाली वाले इलाकों में सर्वेक्षण और लोगों की सूचना की मदद से उसे गिनने की कोशिश की जाती है. इसके लिए हम लोगों से अपील करते हैं अपने आसपास दिखाई देने वाली गौरैया की संख्या की जानकारी हम तक पहुंचाएं. 2015 की गणना के अनुसार लखनऊ में सिर्फ 5692 और पंजाब के कुछ चयनित इलाकों में लगभग 775 गौरैया थीं. 2017 में तिरुवनंतपुरम में दुःखद रूप से सिर्फ 29 गौरैया पाई गईं.’

फादर पी विक्टर ने कहा कि हमारी छोटी-सी कोशिश गौरैया को जीवनदान दे सकती है. सबसे पहली बात कि अगर वह हमारे घर में घोंसला बनाए, तो उसे बनाने दें. हम नियमित रूप से अपने आंगन, खिड़कियों और घर की बाहरी दीवारों पर उनके लिए दाना-पानी रखें. गर्मियों में न जाने कितनी गौरैया प्यास से मर जाती हैं. इसके अलावा उनके लिए कृत्रिम घर बनाना भी बहुत आसान है और इसमें खर्च भी न के बराबर होता है. जूते के डिब्बों, प्लास्टिक की बड़ी बोतलों और मटकियों में छेद करके इनका घर बना कर उन्हें उचित स्थानों पर लगाया जा सकता है. इंटरनेट पर खोजेंगे, तो गौरैया के लिए घर बनाने के बड़े आसान तरीके आपको आराम से मिल जाएंगे. एक बात और, गौरैया को कभी नमक वाला खाना नहीं डालना चाहिए, नमक उनके लिए हानिकारक होता है. प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए.

गौरैया से हमारा बचपन का रिश्ता है. अंग्रेजी में उसका नाम ही है ‘हाउस स्पैरो’ यानी घर में रहने वाली चिड़िया. उसे हमारा बस थोड़ा-सा प्यार और थोड़ी-सी फिक्र चाहिए, रहने को थोड़ी-सी जगह चाहिए…हमारे घर में और हमारे दिल में।

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