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जन्मतिथि विशेष- राही मासूम रज़ा को कितना जानते है आप?

राही मासूम रज़ा का जन्म ग़ाज़ीपुर जिले के ही गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। 11 साल की उम्र में उन्हें टीवी हो गई। उन दिनों टीवी का कोई इलाज नहीं था। इस बीमारी के दरम्यान उन्होंने घर मे रखी सारी किताबें पढ़ डाली।वहीं उनका दिल बहलाने और कहानियां सुनाने के लोए कल्लू काका को मुलाजिम रखा गया। राही मासूम रज़ा ने माना है कि कल्लू काका न होते तो वो कई कहानियां नहीं लिख पाते। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में ‘तिलिस्म-ए-होशरूबा’पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ विश्विद्यालय, में उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।
1968 में राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गाओं, दिल एक सदा कागज, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूंद उपन्यास व 1865 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी ‘ लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। पिछले कुछ वर्षों प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।

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