पंडित नेहरू बच्चों के साथ (सोर्स- गूगल)

भारत में यह दिन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन के मौके पर मनाया जाता है। कहा जाता है कि पंडित नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे इसलिए भारत में बाल दिवस मनाने के लिए उनका जन्मदिन चुना गया।

असल में बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी, जब बच्चों के कल्याण पर विश्व कांफ्रेंस में बाल दिवस मनाने की घोषणा हुई।1954 में दुनिया भर में इसे मान्यता मिल गयी। संयुक्त राष्ट्र ने यह दिन 20 नवंबर के लिए तय किया लेकिन अलग-अलग देशों ने अलग-अलग तिथियां निर्धारित की। कुछ देश 20 नवंबर को भी बाल दिवस मनाते हैं। 1950 से बाल संरक्षण दिवस यानि 1 जून भी कई देशों में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
यह दिन इस बात की याद दिलाता है कि हर बच्चा खास है और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उनकी मूल जरूरतों और पढ़ाई लिखाई की जरूरतों का पूरा होना बेहद जरूरी है। यह दिन बच्चों को उचित जीवन दिए जाने की भी याद दिलाता है।

पण्डित जवाहर लाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरु (14 नवम्बर 1889 – 27 मई 1964) का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयागराज)में हुआ था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री थे।

जवाहर लाल नेहरू का जन्म एक धनाढ्य वकील मोतीलाल नेहरू के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। नेहरू कश्मीरी वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे।
उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लन्दन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्विद्यालय से पूरी की।
जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की।उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए हालांकि उनका परिवार महात्मा गांधी को सपोर्ट नहीं करता था।
नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आन्दोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
1926 से 1928 तक, जवाहर लाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की। 1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया, जबकि मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही प्रभुत्व सम्पन्न राज्य का दर्जा पाने की मांग का समर्थन किया। मुद्दे को हल करने के लिए, गांधी ने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि ब्रिटेन को भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए दो साल का समय दिया जाएगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक राष्ट्रीय संघर्ष शुरू करेगी। नेहरू और बोस ने मांग की कि इस समय को कम कर के एक साल कर दिया जाए। ब्रिटिश सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

पंडित नेहरू महात्मा गांधी और लौह पुरुष बल्लभ भाई पटेल के साथ

दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें ‘पूर्ण स्वराज्य’ की मांग की गई। 26 जनवरी 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आह्वान किया। आंदोलन बहुत हद तक सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया।

नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936 और 1937 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोडो आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड़ दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भागीदारी की।1947 में वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। अंग्रेजों ने करीब 500 देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बड़ी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का समझदारी पूर्वक सामना किया। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ। नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। नेहरू ने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। नेहरू के लिए यह एक बड़ा झटका था और शायद उनकी मौत भी इसी कारण हुई। 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू को दिल का दौरा पडा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई।
भारत की छवि धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में बनाने में नेहरू का अतुल्य योगदान है। लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की जाए तो नेहरू सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि एक परंपरा हैं, ऐसी परम्परा जो कमजोरियों के बावजूद सहनशीलता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

 पण्डित नेहरू के कुछ विचार-

 1) दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाने वाला बुद्धिमान होता है।

2) Children are like buds in a garden and should be carefully and lovingly        nurtured, as they are the future of the nation and the citizens of tomorrow.

3) Freedom brings responsibilities and burdens we have to face them in thae spirit of a free and disciplined people.

                       इन सबके बीच आज बाल दिवस पर आशा है हमारी सरकार कुछ विशेष घोषणाएं करेगी। ताकि देश में बाल मजदूरी, आये दिन बच्चों के साथ होने वाले घिनौने कुकर्म पर रोक लग सके।

और हमारी अगली पीढ़ी एक बेहतर कल में अपने आपको जी सके। हालाँकि भारत सरकार की तरफ से 1098 टोल फ्री नम्बर बाल मजदूरी और बच्चो के संरक्षण के लिए जारी है लेकिन यह कितना कारगर है इसपर कुछ कहा नहीं जा सकता है। विश्व श्रमिक संगठन की वेबसाइट के अनुसार दुनिया भर में 218 मिलियन बच्चे 5 से 17 साल के बीच रोजगार में हैं। उनमें से 152 मिलियन बाल श्रम के पीड़ित हैं, उनमें से लगभग आधे, 73 मिलियन, खतरनाक बाल श्रमिक हैं। जिसमें 88 मिलियन लड़के एवं 64 मिलियन लड़कियां हैं।

यदि आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों के बीच शेयर करें। आप चाहे तो हमें फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो भी कर सकते है। अपने आसपास की खबरों को भेजने के लिए हमें आप हमारी ईमेल आईडी पर लिखे हमारा ईमेल आईडी है thesurgicalnews@gmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here